मैं जन्म दूं तुम्हें
तुम मेरे होने पर प्रश्नचिन्ह दागना
नौ महीने गर्भ में अंदर तू मेरे
और तू मुझे बोझ मापना
दुनिया देख तू मेरी आँखों से
और तू मेरा दायरा सिमटाना चारदीवारी रखना
ऐसा होता है भारत! तेरे सपूतों की माँ,बहन,बेटी,पत्नी बनना
तेरी प्रतिभा खोजती मैं
तू उन्हीं लकीरों से मेरे लिए लक्ष्मण रेखा छापना...
रोक लेना मेरे कदमों को
बढूं जो आगे,धक्का देना
खींचना मुझे और सबक सिखाना
नज़र पर खुद की यंकी ना हो जब मुझे तू मगर पर्दे में ढापना
अपनी पौरूष की बलाएं लेना
अपनी प्रजाति से मिलकर
मुझ पर जोर आजमाइश करना
मेरी सहनशक्ति को
बङे-बङे भाषणों में बांचना
कुचलना मुझे और मेरे इस देह को
तेरे अहम की तुष्टिकरण में
कभी पलटना इतिहास का वो पन्ना
मेरा घर में तेरे कारण ही रहा
दशकों तक सिमटना
तो कभी बाजार तक बिकना
पराजित हूँ,अपमानित हूँ
तेरे अंदर की पाश्विकता का अभी तक होना
मेरे लिए तू कभी रंग रहा सिंदुर का
रंग-बिरंगी कलाई की डोर का
तेरे लिए मैं क्या हूँ?
बस मांस का टूकङा
स्वाद लगे तो ठीक
नहीं तो जहाँ-तहाँ फेकना
ऐसा होता है भारत! तेरे सपूतों की माँ,बहन,पत्नी,बेटी बनना...