पवन ढो रही
व्यर्थ का विलाप,
मिट नहीं पा रहा संताप
इस तपिश का।
सूखते पलाश,
तड़पती हुई सी धूल,
अंबर निहारता है तमाशा
इस कशिश का।
भीतर जल रही आग,
बाहर भी है वही दाह,
क्या यही अंतिम सार है
एक फ़क्कड़ की बंदिश का?
नभ का यह मौन शायद
कोई उत्तर नहीं,
बस एक और मौन संकेत है
किसी पुरानी साज़िश का।

