जाने कब-कब मुस्कराई थी वह औरत
जब से बेहया कहलाई थी वह औरत

जिंदगी का काजल पोछने चली शहर
सिमटी सिकुड़ी सकुचाई थी वह औरत

घरों के बर्तन भांडे तन-मन से धोकर
मालकिन की नजर में हरजाई थी वह औरत

ऊफ्फ! मर्दों की नजर थी कि कयामत थी
अस्मत के डर से घबराई थी वह औरत

उठती उंगलियों का खौफ न था उसे अब
कली थी कभी जो अब मुरझाई थी वह औरत

दर्द ने दिल से तड़प कर कहा एक दिन
जवानी में अश्कों से नहाई थी वह औरत

जागना भी कुबूल था उसे शब भर यादों में
रिश्तों का बोझ ढोते पछताई थी वह औरत

©®जीवन समीर