कुछ न कुछ टूट जाता है
कोई न कोई रूठ जाता है
ये मन की बातें हैं, सैलाब
कोई न कोई फूट जाता है

सपनों का महल हो चाहे
तिनका तिनका छूट जाता है
पकड़ो कितना भी कसके डोर
हाथों से सिरा छूट जाता है

वक़्त की इस तेज धूप में
साया भी साथ छोड़ जाता है
चेहरे पर रख कर मुस्कराहट
अंदर कोई तोड़ जाता है

मंजिल की इस अंधी दौड़ में
सफर ही पीछे छूट जाता है
ढूंढते हैं हम जिसे उम्र भर
वो शख्स ही कहीं खो जाता है
©®जीवन समीर