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कविता


विकसित कमल-सम मुख-छटा, अरुणिम अधर की लालिमा,अलकें सघन घन-श्याम-सी, छिटकी अनूठी कालिमा।​लोचन चपल मृग-शावक-सम, भौंहें धनुष-सी तानतीं,नख-चंद्र की आभा अमिय, सर्वस्व मेरा मानतीं।

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