चले आना
कभी अपनी सरहदों में
ठहर जाना मेरे अनहद में

लौट कर
वापस जा न पाओगे
इस मन से उस मन में

किरचे यादों के
चुभेंगे इस कदर
भूल न पाओगे
इस पांव में कभी उस हथेली में

अक्स बनकर
उतर जाऊंगा आंखों में
ढूंढ न पाओगे
इस आइने में कभी उस ठौर में

खुश्बू बनकर
बिखर जाऊंगा तुममें
हटा न पाओगे
इस सांस में उस स्पंदन में

खोकर मुझमें
पा लोगे खुद को
मिट जाओगे
इस पार से उस पार में
©®जीवन समीर