शाम ये आख़िरी जा रही हैं,
डगर कल सुनहरी आ रही हैं।
कस ले कमर दूर के मुसाफ़िर,
जंग जो छेड़ी है तूने वो आगे भी जारी हैं।
- जितेन्द्र सिंह गढ़वाल


शाम ये आख़िरी जा रही हैं,
डगर कल सुनहरी आ रही हैं।
कस ले कमर दूर के मुसाफ़िर,
जंग जो छेड़ी है तूने वो आगे भी जारी हैं।
- जितेन्द्र सिंह गढ़वाल