Poetry 1 min read 793.2K reads

New year


शाम ये आख़िरी जा रही हैं,डगर कल सुनहरी आ रही हैं।

कस ले कमर दूर के मुसाफ़िर,जंग जो छेड़ी है तूने वो आगे भी जारी हैं।

— जितेन्द्र सिंह गढ़वाल
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