जहाँ से गुजरता था रोज
आज उदास था वो पेड़
अन्य पेड़ों की याद में
जो कटे बारी - बारी
डरता भी है रोज वो
जाने कब वो कट जाये
बातें करते वक्त भी वो
ध्यान धरे था हाथों पर
कि मुँह में चिंता तो है
हाथ में कुल्हाड़ी तो नही
मैं आश्वस्त कर आया उसे
हम सबकी तरफ से कि
ऐसा कुछ ना होगा और जल्द ही
उसका बड़ा परिवार होगा
उम्मीद है खाली ना जायेगा
मेरा ये आश्वासन
मैं तुम वो सब मिलकर
ज़रूर देंगे उसे बड़ा परिवार ^^^^
स्वरचित-
जितेंद्र श्रीवास्तव छत्तीसगढ़
