एक अलग कविता के लिए

मैंने सर्वस्व अपना लगाया

जाने कितनी रातों को

सोच सोच बिताया

जाने कितने अवसरों को

बहानों से ठुकराया

कितने पन्नों को तोड़ मोड़ कर

इतिहास भी बनाया

शब्दों की सजावट में

खंगाले ज्ञान के पिटारे

फिर भी ना लिख पाया

वो अलग सी कविता

मन व्याकुल तन अलसाया

योग्यता पर प्रश्नचिन्ह आया

कभी ना हुआ फिर क्यों

जीवन में यह दिन आया

जाने कब आंख लगी तो

फिर रोज का सपना आया

भूख गरीबी और चीत्कार

चारों तरफ हाहाकार

दबे कुचले शोषित जन

व्यवस्था का झेलते अभिशाप

त्राहि-त्राहि का कृंदन

भ्रष्ट व्यवस्था का अट्ठहास

युवाओं की घोर निराशा

हाथों में काम की अभिलाषा

अमीरों की दादागिरी

नेताओं की बाजीगरी

सहसा आंख खुली

और लिख गई मेरी कविता

रोज की तरह

जिससे पहचान मेरी

हां अलग नहीं

पर सत्य की कविता

जिससे मन भी मरा नहीं

कर्त्तव्य भी मरा नहीं