किंचित भी संदेह नहीं

विधाता तेरी रचना पर

पर जाने क्यों ये मन

चंचल इतना रहता है

ये मेरा ये उसका के

उधेड़बुन में रहता है

अधिक की धुन इतनी

कि पाया भी खो देता है

समझ आती भूल उसे

संकेत विलम्ब का होता है

कर पाता नहीं कुछ वो असहाय

बस हर पल रोता रहता है

^

स्वरचित-

जितेंद्र श्रीवास्तव छत्तीसगढ़