इंसानी दिमाग को 
दीमक खा गई 
शरीर पर खोखला ढाँचा 
धारण किये हुए है ,
जहाँ शक नही करना था
वहाँ शक करते है ,
जहाँ शक होना था 
वहाँ शक बताना तो दूर
जताते तक नही ।

: जीतेन्द्र गुरदह