जरा सोचो कैसे मिलेंगी सांसे

सिमटती जा रही है आंसे ।


माना सुख सुविधा बढ रही है 

मगर इंसानियत मर रही है ।


हरे जंगल कटते जा रहे है 

मौसम बदलते जा रहे है ।


किधर जाएँ यहाँ से अब परिंदे

ध्यान नही दे रहे ये मानव दरिंदे ।


जमाना नए तहजीब मे ढल रहा है 

खुद ही खुद का दुश्मन बन रहा है ।



- जीतेन्द्र गुरदह