सवाल थे मन मे बहुत ,

मगर अब कोई सवाल ही नही रहा ,

जिसको देखो खाए जा रहा है ,

कोई दुर्दशा की ओर देखता ही नही ,

गरीबो की बस्तियाँ उजड़ रही है ,

साहब , किसी को कोई फर्क ही नही पडता,

जिसको हमने गद्दी पर बैठाया,

उसी ने हमको सताया साहब ,

मत भूलों कि हम इस देश की आत्मा है ,

मत सताओ हमे मत रुलाओ हमे,

दुख हमे भी होता है ,

जिसको भी देखो पीछे पडा है ,

क्या हम इन्सान नजर नही आते ,

हम गरीब है साहब , मत सताओ हमे,

पता नही ,

तुम्हे हमारा खून पसंद है या जान,

लेकिन एक दिन भटकते हुए ,

ये भी चली जायेगी , 

हम बेबस लाचार है मत सताओ हमे ।।



~जीतेन्द्र मीना (@Jitendragurdeh)