ये इन्सान कितना बेरहम है

रहम ना किया प्रकृति पर भी 

कुछ भी ना लिया प्रकृति ने 

जीने के लिये सांसे दी फिर भी ।


ये इन्सान कितना मतलबी है 

इतना बेरहम कैसे बना 

कुल्हाडी उठाते समय थोडे

भी आँसू ना आये आंखो में 


ठंडी-ठंडी हवा लेता है 

छांव मे बैठकर 

काट देता है उस पेड को

मतलब निकल जाने पर ।


रहम करो प्रकृति पर 

जाओ ना अपनी आकृति पर

कितना मेहनत करती है प्रकृति 

कभी एक पेड लगाकर देखों 


कैसा होगा भविष्य 

आने वाली पीढियों का 

शायद तरसना होगा 

साँस-साँस के लिये ।



- जीतेन्द्र मीना