पता नही शायद गलती किसकी थी,

चाहा हमने ही था उसे 

वो हमे नजरअंदाज करते रहे ,

देखकर हँसना उनकी आदत थी या मजबूरी 

समझ नही पाया मै,

अंदाज किया तो पता चला

आदत ही थी ,

दुखी था बेबस था मै मगर शांत था,

मेरी गलतफहमी थी लेकिन एक उम्मीद थी ,

होगा सफल मेरा प्यार एक ना एक दिन,

बस यही आस लगाये उससे नजरें मिलाते ,

छोड़ ही दिया उसने आजकल नजरें मिलाना ,

बस आवाज ही बाहर ना आई

बाकी सब हाल हुआ ,

उसका नजरअंदाज करना ही सब बजह बना, 

उसकी कोई गलती तो नही , चाहा मैने था उसे ।।


~ जीतेन्द्र मीना