मन मसोसकर रह जाता है
जानबूझकर चुप हो जाता है
कहने की हिम्मत नही उसकी
बैठे-बैठे आती रहती है सिसकी
मन नही होता कहने को
पैसे नही कुछ खरीदने को
गरीबी बेबसी लाचारी है
यह तो खास बीमारी है
दीवानी है इसके गरीबी
बचपन है इसके करीबी ।
- जीतेन्द्र मीना


मन मसोसकर रह जाता है
जानबूझकर चुप हो जाता है
कहने की हिम्मत नही उसकी
बैठे-बैठे आती रहती है सिसकी
मन नही होता कहने को
पैसे नही कुछ खरीदने को
गरीबी बेबसी लाचारी है
यह तो खास बीमारी है
दीवानी है इसके गरीबी
बचपन है इसके करीबी ।
- जीतेन्द्र मीना