तुम धूप सी छिपती रही, पर, रोशनी तो तुम से ही। तेरे न मिलन के कारण ही, मेरे मन का भय एक मलाल था। मैं मरुस्थल भयभीत था, तुम नदी बहती रही। तुम धूप सी छिपती रही, पर, रोशनी तो तुम से ही। कई द्वंद्व किए, कई द्वंद्व हुए, कुछ द्वन्द कभी न ख़त्म हुए , तुम थी नदी तो खो गयी ,किसी समंदर की हो गयी ,कहते है हम सितारों से ,मुझे क्यू रुलाकर नदी कर गयी। मैं मरुस्थल भयभीत था कि तुम नदी सी बह गयी । तुम धूप सी छिपती रही, पर, रोशनी तो तुम से ही,रोशनी तो तुम से ही।
