शादी...लड़की के लिए,

दस्तूर है...फ़ितूर है…

और ये लड़की...ख़्वामख़्वाह ही मजबूर है।

जिस से उसकी शादी हुई,

वो उसका हुज़ूर है,

और ये लड़की...ख़्वामख़्वाह ही मजबूर है।

 

हाज़िर हैं उसके कपड़ों की धज़्ज़ियाँ,

तेरे पलंग किनारे,

बेताब निगाहों से,

शादी का महत्व बताते, भूल गया,

के वो तूने ही उतारे।

वो उसका नंगा बदन अंधेरे में, कुछ तो कहता ज़रूर है,

और ये लडक़ी… ख़्वामख़्वाह ही मजबूर है।

 

एक बज़्म में बिठा कर उसे तार-तार कर,

शहेंशाह की तरह तू राज़ बार बार कर,

शादी का अर्थ ही यही,

की वो घर छोड़े, माँ-बाप छोड़े,

नाम छोड़े, पहचान छोड़े,

तो फ़िर बुरा क्या की तू उसे बदनाम ज़ार ज़ार कर।

वो नज़रों से बहा हर कतरा तेरा ही कसूर है,

और ये लड़की….ख़्वामख़्वाह ही मजबूर है।

 

चल तू एक बार मर्दानगी का सबूत लेने,

हाँ.. अस्पताल के मैटर्निटी सेल से तेरे क्या लेने-देने,

पर जब वो बच्चा, न…

मर्दानगी का सबूत पैदा होगा, यौनि का एक एक हिस्सा चीर कर लहू का एक एक कतरा बहेगा,

तब तेरी खुशी के क्या ही कहने।

शुक्र है वो शांति के दरिया में भाव-विभोर है,

तू पाग़ल है...जो समझता है कि ये लड़की..ख़्वामख़्वाह ही मजबूर है।