पनघट में 
सवेरे अंधियारे
पनियारी को छेड़े
सजन बने ओस
कदमों पे उसके लिपट पड़े
तन सारा भिगोए झटपट से

दांतो से पकड़े घूंघट
कुएं से गागर खींचे जब
भागे आगे पीछे
करे शरारत भरके रे!

हंसे हौले से पनियारी
धूप को लटो से खोले जब
पागल प्रेमी को विदा करे
जल छलकाए 
छलक छलक...