साँझ हो गयी वैरागी मन

घर अपने तुम आ जाओ,

क्यूँ ढूँढ रहे तुम देव को मेरे

हैं वो साथ तुम्हारे अब आ जाओ;

साँझ हो गयी वैरागी मन

घर अपने तुम आ जाओ ।

क्यूँ करम पुण्य में भटक रहे हो

क्यूँ पुनर्जीवन में अटक रहे हो?

सुन लो जीवन सार यहीं पे

जीवन मुक्त हो जाओ यहीं पे।

लक्ष्य बनाये जो जीवन के

उनमें तुम समा जाओ,

वेदान्तों का सार यहीं पे।

उनसे तुम कुछ पा जाओ

साँझ हो गयी वैरागी मन

घर अपने तुम आ जाओ,