बीज बोता हॅू

हल चलाता हॅू

खेत सींचता हॅू

फसल काटता हॅू

अनाज सब्जी फल खाता हॅू

और सबको खिलाता हॅू

बाकी दुनिया से

थोडा अंजान हॅू मैं

किसान हॅू मैं

माटी की महक

खींचती है मुझको

चिडियों की चहक

बुलाती है मुझको

सावन की बूँदें

भिगोती हैं मन को

वतन का सिर्फ

गुजरा कल नही’

आने वाला

कल भी हॅू मैं

किसान हॅू मैं

बीज की अंकुरता को

स्नेहता हॅू मैं तो

पेड बने पौधे को

मोहता हॅू मैं तो

भोजन बनाती किरणो’

को निहारता हॅू मैं तो

बादल की नरमी को

पुकारता हॅू मैं तो