इन दिनों -
जीवन थोड़ा थमा - थमा सा है।
जीवन थोड़ा रुका - रुका सा है।
है घनघोर सन्नाटा चारों तरफ,
मानों जैसे शोर मर सा गया है।
एक बेवक्त और मायूस करने वाली मौत,
शायद शांति ने उसका गला घोंट दिया है।
या फिर हो सकता है कि उसे चाकू से गोदा हो,
या चुपके से हवा में ज़हर मिला दिया हो।
पर जो भी हो, मौत तो हुई है ना शोर की,
मातम तो छाया ही हुआ है ना हर ओर।
लगभग दो सप्ताह बीत चुके हैं इस बात को,
लेकिन उसका असर हर तरफ फैला हुआ है।
वक्त के दिलो-दिमाग में तो मायूसी छाई ही हुई है,
पर आखिर शांति की ऐसी हालत क्यों हुई है?
क्यों वह चुपचाप एक कोने में पड़ी है?
क्यों उसकी भी आंखें आंसुओं से नम पड़ी है?
क्यों उसने चौदह दिनों से खाना नहीं खाया है?
क्यों, क्या अब उसे भी अपने किए का अफसोस है?
नहीं, मुझे अफसोस नहीं पछतावा है।
हाय आगोश में मैंने यह क्या कर डाला है?
दुश्मन नहीं था वह मेरा, बस उसकी सोच अलग थी।
फिर क्यों मैंने उसे मौत की नींद सुला डाला है?
अब क्या बचा है मेरा भी कोई वजूद?
जैसे बगैर अंधेरे के होती है रोशनी बेमतलब,
उसी तरह शोर के बिना मैं भी कुछ नहीं।
अब बस अपनी आखिरी सांसें गिन रही हूं मैं।
आहिस्ता - आहिस्ता तड़प रही हूं मैं।
धीमे - धीमे मर रही हूं मैं।
धीमे - धीमे मर रही हूं मैं।
अलविदा।
आभार
जयंत सिंह ✍️


