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भूख - जावेद अख़्तर

आँख खुल मेरी गई हो गया मैं फिर ज़िन्दा पेट के अन्धेरो से ज़हन के धुन्धलको तक एक साँप के जैसा रेंगता खयाल आया आज तीसरा दिन है आज तीसरा दिन है एक अजीब खामोशी से भरा हुआ कमरा कैसा खाली-खाली है मेज़ जगह पर रखी है कुर्सी जगह पर रखी है फर्श जगह पर रखी है अपनी जगह पर ये छत अपनी जगह दीवारे मुझसे बेताल्लुक सब, सब मेरे तमाशाई है सामने की खिड़्की से तीज़ धूप की किरने आ रही है बिस्तर पर चुभ रही है चेहरे में इस कदर नुकीली है जैसे रिश्तेदारो के त
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