रात थोड़ा बेचैन सोया,
हां स्वप्न में तो खूब रोया।
रात्रि के तीसरे पहर
देखा मैंने एक सपना,
एक लड़का हां ऐसा लड़का
जिसका कोई न था अपना।
यका यक न जाने कैसे
एक बच्चा स्वप्न से में खोया,
अचानक न जाने कहा से
वो पास आकर न बोला न रोया।
मागन से मरना भला है,
न जाने कैसे वो था जानता,
भूख की अग्नि में जलता किन्तु
स्वयं के सम्मान को पहचानता।
अपने नन्हे हाथों से
मेरे हाथों को खोज लिया,
निर्मल नन्ही सी आंखो से
मन मोह लिया जी मोह लिया।
हाथ मेरे जब पात्र पाया
बाल मन में उल्लास छाया,
दूध मैंने उसे जब दिया
कुछ ना नुकुर कर फिर पिया।
उसने कुछ जब विश्वास पाया
मुझको बताया कि वो है अनाथ,
चाहता था ले जाना उसे
किन्तु न कर सकता था उसे सनाथ।
कुछ देर बैठा वहां पर
कुछ पैसे दिए,नंबर दिया,वादा किया,
सकुचाकर लिए, किन्तु जाता जानकर
उठ, गया वहां से न बोला न रोया।
रात थोड़ा बेचैन सोया,
हां स्वप्न में तो खूब रोया।
- प्रताप सिंह


