बड़े भाई की बगिया एक, पौधे है उसमे अनेक।
बड़े प्यार से उसने सींचा,मधुर मनोरम है प्रत्येक।।
पहले दिन सब पागल कहते,कहते समय की हानि करेगा।
उसे डरा सहमा कर कहते,बिन पानी हर विटप मरेगा।।
चाचा से खाई थी डांट,फिर भी बात न बांधी गांठ।
कही अनसुनी करके,बोले आजा आज बंटा कुछ हाथ।।
उठा फावड़ा कर दिया चौकस, पोधों पर ही पूरा फोकस।
कई विलक्षण पोधे उसमे, छोड़ के एक दो जैसे लोटस।।
होते है सब काम समय से, समय से खाद समय से पानी।
दिन दोगुना रात चौगुना बढ़ते जाते, जैसे पाते हो गुद्धानी।।
जागे हैं वे इसी भोर में, सुन्दरता के इसी दौर में।
बगिया की बस शोभा ना चाहें,पीछे की मेहनत पे गोर दें।।
होगी प्राप्ति मेहनत के रस की,या वही दुर्दशा उसकी।
होगा वही जो वो चाहेगा ,नहीं ये तेरे मेरे बस की।।
- प्रताप सिंह


