प्यास बड़ती ही चली जाती है 
कोई काविश न काम आती है 

यूँ तो होशो-हवाश में हूँ मैं 
बात कोई समझ न आती है 

ज़िंदगी यूँ ही जिऐ जाता हूँ 
कोई ख़्याइस नहीं सताती है 

कुछ मरासिम अभी भी ज़िंदा हैं 
मेरी तन्हाई ये बताती है 

गौर से सुन सको तो सुन लेना 
तुमको कोई सदा बुलाती है 

अनिल कुमार

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