धुंधला सा कुच्छ किरदार भी है,
रहती ज़हन मे कुछ बातें बेकरार सी है,
कहाँ गया वो मंज़िल को दीवानेपन तक देखना,
क्या कुछ दूर निकल गयी वो राहगुज़ार भी है।
सोचते है की आए फ़िर ख़्याल वो इन्कलाबी,
पिछले इरादों से गुफ्तगू जो अब तलक भी है,
कुच्छ इस कदर नज़्म हमारी बेपरवाह हुई है,
अल्फाज़ जो दिल का आईना थे वो अब शर्माते भी है।
चलिए कुच्छ कम तो होगी मसरूफीयां इस बहाने,
भरे हुए ज़ख्मो को फिर कुरेदना भी है,
यूं ही समझ लीजिए की लम्बी सैर पर निकला है शायर,
लौटेगा की ग़ज़ल मे आखरी शेर जोडना भी है
लौटेगा की ग़ज़ल मे आखरी शेर जोडना भी है।


