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सपने सबके अपने अपने

सपने सबके अपने-अपने ,

हम सपनों से बेगाने है।

जिस मिट्टी पर है जन्म लिए,

उस मिट्टी के परवाने है।

नहीं चाह हमें है अंबर की,

तन ढकते है दुनिया के लिए,

मुठ्ठी भर से मन भर जाता,

पर खटते हैं दुनिया के लिए,

थालि भर के सबके घर की,

रहते घर से बेगाने है,

सपने सबके अपने-अपने हम

परवाह नहीं है तुफां का,

खतरों से खेल ये सिखा है,

ये इश्क मोहब्बत ना जाने,

हर बगिया दिल से सींचा है,

सींचे है रिश्ते गांवों में,

हमें लगते शहर वीराने हैं, 

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