गागर में सागर सिमट जाए शायद,
मुश्किल है ईर्ष्या वो तृष्णा सिमटना।।
इसी ने लगाईं आग इसी ने बुझाई,
महल छीन किसी का किसको दिलाई,
इसी ने रचाई फसादों की रचना,
मुश्किल है ईर्ष्या वो तृष्णा सिमटना।।
भाई से भाई को इसी ने लड़ाई,
मजबूर कर के हाराई जिताई,
इसी ने सिखाईं सभी को हड़पना,
मुश्किल है ईर्ष्या वो तृष्णा सिमटना।।
अमरता का वरदान लेकर के आईं,
सभी के दिलों में निरंतर है छाईं,
बाचा न कोई और दुष्कर है बचना,
मुश्किल है ईर्ष्या वो तृष्णा सिमटना।।
हर युग में है ये सभी ने बताया,
साबुत है ग्रंथ क्या मैं दुं सफाया,
खिलायी है दशरथ पितामह को सदमा,
मुश्किल है ईर्ष्या वो तृष्णा सिमटना।।

