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मुक्तक


थोडा़ सा डर गया था उस रात देखकरसाँसें सी रुक गईं थीं हालात देखकर

मुश्किल की वो घड़ी थी पर मैं अडा़ रहाअब डर ही डर रहा है जज्बात देखकर

— जे0 पी0 धुरंधर
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