ख़ाली ख़ाली सा आस्मा
सूनी सूनी सी ज़मीं,
दूर कहीं उड़ गया वो परिंदा
जो पहले था यहीं कहीं।
दो बरस से भीगी आंखें
है तो बस बूँदों की कमी,
अब तो बरस अए मेघ
हमसे किस बात पर ठनी।
बंजर जमीन पर शज़र सूखा था जो
बाहें फैलाये है के कब आये सावन और गले लगाए वो।
ख़ामोश नज़ारे में शोर कैसा ये घुल गया
शायद किसी मिट्टी के घड़े को तर कुआँ कोई मिल गया।
सब ने लगाई एक दूसरे को आवाज़, "आओ किस्मत का दरवाज़ा खुल गया"।
अब ना रोयेंगे बच्चे प्यासे हमारे, सबकी दुआओं को असर मर्तबा मन्नतों को मिल गया।
थाम कर एक दूसरे का हाथ सबने लगाई दूर तक आवाज़
"ले आओ बर्तन घर के, भर लो है मेहनत का पानी
फिर मीले न मिले ये है रहमत का पानी"।
गाँव की पथराई ज़मीं
दो बरस से देखा ना था सावन,
इससे पहले तो कभी ना थी कमी
जम के बरसता था ये सावन।
यादों के झाँरोखे में झांका तो देखा
तब हर ज़ात ओ मज़हब की तरह यहाँ बटा था हर कुआँ।
अपनी सोच की तरह बाँट कर पानी को,
चैन आता था इन्हें और इनकी गुरूर ए जवानी को।
जब बेपनाह मीली नियामतें
तब बांट लिया खुद को,
जब थी रब की मेहरबानियां
तो खूब की मनमानियां।
पर आज जब
एक सी हैं मुश्किलें,
तो ऐसे मिले जैसे
कभी ना थे शिक़वे गिले।
तुम क्यों कहते हो धर्म-वर्म
तुम क्यों करते हो वार यार,
उसने तो बनाया हव्वा ओ आदम
यही तेरी ज़ात,
उसने तो सिखाया प्यार,
यही तेरा हथियार।
अब तो वो परिंदा भी लौट आया
जो छोड़ चला था ये ज़मीं,
इसलिए नही के बरसा है सावन,
इसलिए के अब नही यहां प्यार की कमी।
अब तो जल बरसे ना बरसे यार कौन तरसता है,
मिल गयी मंज़िलें हमे यहां प्यार जो बरसता है।
~Ayman Jamal.