कल शाम अपने घर मे
तन्हाई के पहर में,
एक आईने के आगे
बैठी जो सर उठा के,
आँखों ने फिर वो देखा,
जो सामने खड़ा था,
नज़रों में खशमाकश थी।
क्या था वो मेरा साया, या कोई दूसरा था?
नैन नक़्श वही थे,
रंगत भी तो वही थी।
फिर दिल मे क्यों गिला था,
ये कोई दूसरा था।
कुछ थम के मैं खड़ी थी
कुछ तन के वो खड़ा था,
बेचैनियों का आलम
फिर मुझमें यूँ रवां था।
हस पड़ा वो कह कर,
"क्यों देखती है ऐसे?
नज़रें यूँ के मुझको
देखा नही हो जैसे।"
मैं सोच ही रही थी
के बोल फिर पड़ा वो,
"था तुझमें ही सदा मैं
था तुझमे ही रवां मैं,
अहंक का शोर तुझमे
था ऐसा गूँजता की,
मैं बोलता रहा पर
सुनती कभी न मुझको।"
क्रोध की जो शम्मा
तूने जलाई दिल मे,
झुलस रहा मैं उसमे
परवाने की तरहा ही।
क्यों रौंदी मेरी हस्ती
क्यों मुझको यूँ सताया,
था तेरा ही सगा मैं,
फिर मुझको क्यों रुलाया।"
यूँ तोहमतें लगा कर कहता रहा वो मुझको,
"करके मुझे यूँ बेबस आई हया ना तुझको?"
फिर शर्म से यूँ मेरी
आँखें जो झुक गयी थी,
ना था वो जस्बा दिल मे
कि सुन सकूँ मैं आगे,
कि अपनी खामियों को
फिर गिन सकूँ मैं आगे।
जीने का हक़ था उसको भी
जो सामने खड़ा था,
मेरी सोच के आगे उसके
नज़रिये का कद बड़ा था।
ये समझने में मुझको थोड़ी
देर हो गयी पर
अब अपनी हस्ती बनाना
मुझको भी आ गया था।
ये शुकराना उसका
जो सामने खड़ा था,
जो था के मेरा साया,
जो मेरा हमरावां था।
अलविदा से पहले
देखा उसे पलट के,
आंखों में फिर चमकती,
होंठों पे फिर थिरकती
दोनों के एक हसी थी।
फिर घुल गयी वो बातें
तन्हाई के पहर में,
और जी गयी मैं फिर से
कल शाम अपने घर मे।
~ Ayman Jamal.