तुम्हारी कमी,

पूरी करती है यह कलम मेरी।


थाम लेती है हाथ मेरा,

कस के पकड़ लेती है उंगलियों को मेरी।


आसुओ को शब्द बना कर,

पिरो देती है कविता में।


तुम्हारी तरह कभी-कभी समझ नहीं पाति मुझे ,

पर कोशिश करती है समझने की।


कमी महसूस तो होती है तुम्हारी,

पर यह अकेलापन महसूस नहीं होने देती यह कलम मेरी।


-Jलj