कुछ है नहीं बाहर बस ये अन्दर ही अन्दर बिखरा था बाहर सिर्फ स्याही थी .. अन्दर पूरी तबाही थी इतनी सरहदे बाहर न थी , जितनी अंदर दीवारे थी । जिस उलझन से ख्वाहिशे परेशां थी ... वो बाहर बिलकुल अनजान थी ।।