
हुनहर तो हर किसी का अपना होता है
फ़िर क्यों बन जाते है हम एक जैसे
तरीक़े तो अलग अलग़ हो सकते है
फ़िर क्यों सूझती है तरकीबें एक ही जैसी
बचपन तो दिशाहीन हुल्लड़ मचाने का दौर होना चाहिए
फ़िर क्यों समाज की मशीनरी में पीसते है हम उन जैसे
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