ए बहती हवा
इस दर्द-ए-दूरी में
जा
बन जा तू मेरी दवा
मिले उनसे तो ज़रा कहना
की तेरी इस नमी में
मेरी आँखों का बहता गम है
मगर तुम हमेशा खुश रहना
ठीक है.......
ये है नहीं ज़रूरी
हर मुसाफिर का मंज़िल को पा लेना
जानती हूँ मैं
कुछ नदियां मिलती नहीं समंदर से
बहुत सी लहरें भी होती है बेठिकाना
हाँ
मिलता नहीं हर रात को
चौदहवीं के चाँद का नजराना
हर फूल सजता नहीं सर पे
हज़ारों की खूबसूरती को पड़ता है
ज़मीं पे ही दम तोड़ जानाq
और
कभी-न-कभी तो पड़ता ही है
उस तारे को भी अपने
आसमान से टूट बिछड़ना
हर ज़मीन को नसीब होता नहीं
वो मस्ताना सावन सुहाना
ना ही
किस्मत में लखि होति
हर शायरी का पूरा हो पाना
और सच है ये भी की
ऐसे ही अकेली हूँ नहीं मैं
यूँ ही बहुतों का रह जाता है
ये अधूरा सा अनजाना
दिलकश दीवाना
मोहब्बत से मुकमल उनका अफ़साना
-जागृति

