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वो अधूरा अफ़साना

ए बहती हवा

इस दर्द-ए-दूरी में

जा

बन जा तू मेरी दवा

मिले उनसे तो ज़रा कहना

की तेरी इस नमी में

मेरी आँखों का बहता गम है

मगर तुम हमेशा खुश रहना

ठीक है.......

ये है नहीं ज़रूरी

हर मुसाफिर का मंज़िल को पा लेना

जानती हूँ मैं

कुछ नदियां मिलती नहीं समंदर से

बहुत सी लहरें भी होती है बेठिकाना

हाँ

मिलता नहीं हर रात को

चौदहवीं के चाँद का नजराना

हर फूल सजता नहीं सर पे

हज़ारों की खूबसूरती को पड़ता है

ज़मीं पे ही दम तोड़ जानाq

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