दिल को क्या भाये यह नज़ारा
अम्बर के बाहों में झूलता वह
मन भाबक देखो आज है अधूरा
यह तहज़ीब उसकी जो लगे इतना प्यारा
शराफत से छुप जाए बादलों तले
शरारत का सर ताज पहने महबूब मेरा
कभी छुप जाए , कभी झलक दिखलाए
खेलता रहता हरदम नज़रों के साथ पर
मूँद के भी पलके इस से नज़र हट न पाए
सूरत शांत इतनी की देख सीला पिघल जाए
ऐसा माशूक़ कहाँ नसीब सबके
जिसके सुरूर में तोह लोहा भी तरल जाए
सूखे होंठों को मेरे यह रोशन कर जाए
सूनी हो बे-रस आँखे जब-जब मेरी
साजन मेरा सजाने उन्हें मुझ में उतर आए
फर्क पड़ता नहीं अगर भी हूँ मै बेज़ार
मेरे जिसे होंगे दिल में सजाने वाले इसे
काबिल-ए-तारीफ़ मुन्तज़िर शायर हज़ार
यही है हमारे दस्तूर-ए-रिवायत
हर फुरक़त-ए-आशिक़ को होती ही है इस चाँद से
क़ुरबत से रुहानियत भरी मुहब्बत
-जागृति
