घर से पाँव निकलते ही
बेकरार धुप मेरे गले लग गई
बादलों के पीछे इंतज़ार कर रही थी मेरा मिलते मुझसे
चेहरे पे चमक गई
हवाएं बदन से मेरे फिसल रही थी
लगा ये फ़िज़ाएं भी मुझसे कुछ पूछ रही थी
चिड़ियों ने चीख में गूंजा
की इतने दिन तुम हमसे जुदा कहाँ गई थी ?
तो फूलों की खुशबू ने तबस्सुम से कहा
की वो खुद मैं ही कहीं सो रही थी
पर मेरी चेहेक्ति मुस्कान ने इंकार के कहा
की नहीं , मै ख़ुदी मै ही कहीं खो गई थी
जो दूर मैं खुद से हो गई थी
-जागृति
