जरा नजरें तो टेक
क्या खूब ये नजारा है
मिलने मुझ से आया चाँद
पर बादलों का पहरा है
खो चुका है आसमाँ
मदहोश करने वाला है
आज मुझे ये समा
खुद को संभाल लूँ ज़रा मैं
आज होश नहीं खोना है
बिखरी है चारों ओर चाँदनी
फिर भी नजर आता
तारों का चेहरा प्यारा है
इस आलम में
जहां मदमस्त होगी जुगल कोई
तो वहीँ खामोशियों को सुनता
बैठा कहीं तन्हा कोई बेचारा है
इस चाँद को खबर हर किसीकी
ये तो सभी के दिल का तारा है
ज़रूर आज होगा कोई
मना रहा रोशनी का जश्न
पर दूजी और तो कहीं
किसी को तम ही गवारा है
ज़रा नज़रें तोह टेक
क्या खूब ये नजारा है
धुंदला है चाँद
फिर भी लगता कितना प्यारा है
दूर है जाने कितना मुझसे
वावजूद लगे मुझे ऐसे
मानो जैसे वो मेरा ही है
जरा नजरें तो टेक
क्या खूब ये नजारा है
-जागृति
ो

