मैं इश्के मज़ाजी* हूं न बिछड़ने से मुहब्बत नहीं मरती
तू इश्के हक़ीकी+ है इस बिछड़ने से मुहब्बत नहीं मरती
सफ़र दर सफ़र दूर होते गए हम, ख्यालों के वसीले में
मगर एहसास-ए-तख़य्युल^ से क़ुर्बत नहीं मिलती
मिलके रखे थे गुलाब ख्वाबों के किताबों में हमने
अब चूर चूर सूखे हुए गुलों से उल्फ़त नहीं मिलती
आबदीदा है चेहरा खामोश हंसी का तमाशा है सरे बज़्म
किसी को इन गैर महफ़िलों से उंसियत नहीं मिलती
पूछ लिया करते हैं खैरियत दोस्त-ओ-अहबाब अक्सर
गो अपनेपन की पराई चौखट से सुकूनत नही मिलती
खामोश बहुत है परिंदा बाद मुद्दत तूफ़ान गुजरने के
यूं टूटी हुई शाख़ पे किसी से रग़बत नहीं मिलती
भर जाएंगे ज़ख्म धीरे धीरे वक़्त के मरहम से
हाल कौन पूछे कहीं किसी से निस्बत नहीं मिलती
एक लम्हे के लिए वस्ल की चाहत रह गई दिल में
टूट जाए डोर गर चर्खी से रियायत नहीं मिलती
वक़्त ख़त्म हुआ समेट लो बोरिया शेरी अपने ठिकाने से
इतने सस्ते किसी को कहीं से फ़राग़त नहीं मिलती
-इस्लाम 'शेरी'
*सांसारिक प्रेम
+आध्यात्मिक प्रेम
^ विचारों की अनुभूति
सुकूनत- शांति
रगबत-सहयोग
फरागत-छुटकारा
