कई दिनों से एक सवाल है मन में

जो मुसलसल रुला रहा है

हर रोज़ नई सुबह देकर सहला रहा है

मगर ना जाने क्यों?

वहीं शहर बदला बदला सा नज़र आ रहा है

बीतिं रात नशे में था या बेहोशी की हालत में

या कहीं किसी ख्वाब ने उलझा रखा था

याद करने की कोशिश तो बहुत की मगर

क्यों ये भूल जाने को कह रहा है?

क्यों मेरे हर सवाल का उत्तर ये सिरहाने 

रखकर गायब हुए जा रहा है?

कोई तो रास्ता होगा इसे तलाशने का

आखिर क्यों ये बार बार वहीं

खाली कागज़ दिखाकर

हज़ार बातें छुपाए जा रहा है?