आँगन मे रखा तुलसी का पौधा तेरी याद दिलाता है , 

जब मेरी आँख तेरा गीत सुनकर उठा करती थी , 


आज भी मुझे याद हैं वो खुशबू जो तेरे दिये जलाने से महक उठती थी, 


 इत्र की दो बुँदे वो अमृत समान थी जब तू अपने हाथों से छिडका दिया करती थी , 


शायद अब कोई घण्टी बजाता ही नही है , 

जब तु थी तब वो कोयल का गीत हुआ करती थी, 


प्रशाद का लड्डू अब फीका लगने लगा 

लगता है तू उसमे अपने प्यार का रस घोला करती थी, 


हाथ अब भी जोड़ता हू और तब भी जोड़ता था,

अब बस इस बेजान सी रूह की कोई तमन्ना नही 

अब बस इंतज़ार करता हू चाँद को देखकर की कब मे अपने चाँद को निहारु ।