मज़हब-ए-इश्क़ इख्तियार करूँ
सोचता हूँ किसी से प्यार करूँ
वादा करें वो लौट आने का
और मैं ता-उम्र इन्तिज़ार करूँ
झूठे वादे पे रोऊँ शब भर
सहर को फिर से ऐतबार करूँ
दुश्मनी जिससे रही सदियों तलक
जाते जाते उसी भी यार करूँ
"ईशान" ढूंढ रहा हूँ काफ़िर
अपने दिल का जिससे क़रार करूँ


