ग़ज़ल कहता हूँ मैं इसके सिवा कुछ कह नहीं पाता
मैं तन्हाई का आदी भीड़ में अब रह नहीं पाता
वो दिन कुछ और थे जब हम भी लड़ लेते थे दुनिया से
अब ये हालत है आवाज़ ऊँची सह नहीं पाता
वक़्त एक खेल है सबको दिखा देता है औक़ाते
बहुत थे जिनको दम था मैं किसी से शय नहीं पाता
खुदा को ढूंढने वाले खुदा को ख़ाक ढूंढेंगे
मैं खुद को ढूंढता हूँ तो खुदही में मैं नहीं पाता
"ईशान" सोचता हूँ मैं उछाला मार कर देखूँ
मगर अपने ग़म-ऐ-दरिया की कोई तह नहीं पाता


