अब मन नहीं है... 

संवारना इस घर को, खुद को, सब कुछ उनके मुताबिक करना 

अब मन नहीं है....

वो पसोपेश में रहना, ये ग़लत वो सही

वो तीखे धीमें तंज़ वो सिसकियों से रोना

संजोना वो खुद को, फिर वोही सपने पिरोना

अब मन नहीं है...

अवहेलना, वो करवट, वो हमारा अदृश्य होना

अब मन नहीं है...

मनाना खुद को खुद ही और उनके मन की पूरी खाता बही

हम थक चुके हैं और तुम हो अब भी वही

अब मन नहीं है...

रहे बिखरा घर अब और हम बेरंग रहे

ना सजाएं खुद को न तुम्हारी ही परवाह करे

अब मन नहीं है...