छप्पर फाड़ के देता है वो

बीन रहे तिनका तिनका हो।


हाथ सुमिरिनी लटकाए हो

गिनते तुम मनका मनका हो


तीनों जहां का जो मालिक है

कैसे फिर वो सिर्फ तेरा हो।


जब से जग में तू आया है

पग पग तेरे साथ चला वो।


जाने क्या उसके मन में है

क्यों रचता ये खेल यहां वो।


जितना काम दिया करने को

उतना ही करना है सबको।


उसका भेद न जाने कोई

जो जाने, खो जाए खुद वो।


- इन्दु प्रकाश