यूँ तो सावन की फ़िज़ा कुछ और है
टूटे छप्पर की सदा कुछ और है।
आसमां खुद में मगन बेशक रहे
इस परिंदे की अदा कुछ और है।
मन्ज़िलों की अब किसे परवाह है
मेरा मकसूद ए सफऱ कुछ और है।
सांस लेना ही नहीं है ज़िन्दगी
ज़िन्दगी का सिलसिला कुछ और है।
उसको पहचाने न जाने है कोई
सब कहें कुछ और,वो कुछ और है।
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