घूमने-फिरने को वो गलियां ना रही,

जिसे देख कर हम मुस्कुरा जाए,

वो हस्तियां ना रही,

फैला आब-औ- हवा में जहर,

पहले वाली वो हंसी-ठिठोलियां ना रही,

अक्कड़ कर बैठते थे जिस नुक्कड़ पर,

वो नुक्कड़ वाली चाय ना रही,

बतलाते थे अपने हिस्से का भी,

वो किस्से वाली बात ना रही....

"इंद्राज योगी"