रही सदा से ही शिकायत,
रहे सदा ही असंतुष्ठ ये,
कौन थे,
कहां के थे,
वो चार आदमी....
हर वक्त मौजूद रहते,
हर जगह,
हर स्थान,
वो चार आदमी....
लोक लाज़ इनसे डरे,
लोग सब सोचे समझे करे,
रहता डर,
सभी को इनका,
क्या कहेंगे,
वो चार आदमी....
हो प्रदर्शनता की बात,
आए सर्वप्रथम इनका नाम,
देखेंगे,
अति उत्तम बतलाएंगे,
वो चार आदमी.....
इज्जत हो शर्मसार,
झुके जब भी मान,
भय सताता,
सबको इनका,
बेइज्जत कहेंगे,
वो चार आदमी....
वाचाल,व्यंग्यकार,अतिशियोंक्ती,
है ये गुण इनमे खास,
इज्जत की किसी का,
उड़ाएं उपहास,
वो चार आदमी....
हो प्रशंसा या कार्य उच्च,
बिन ढिंढोरा प्रचार करे,
वो चार आदमी....
हो इज्जत निलाम,
या कलंक कोई खास,
इज्जत उछाले जमकर,
वो चार आदमी....
समाज में उपस्थिति सदैव,
रखें निगाहें टकटकी लगा,
वो चार आदमी....
हो उत्सव या कार्यक्रम कैसा,
देते परिमाण देते,
आए विपदा संकट कोई,
एकजुट होते,
जन्म हो या मृत्यु,
देखो काम आते,
वो चार आदमी....
आपस में ही बात करते,
देखो ऐसा उसका,
देखो वैसा उसका,
वो चार आदमी....
हमे तो रहना,
इन पर निर्भर,
है कौन,
वो चार आदमी....
दे जाए सुख-दुख मे साथ,
चले मिला हाथो से हाथ,
है तब आदमी,
वो चार आदमी....
रहे सुरक्षित बहू-बेटी,
बचा सके उनकी आबरू,
है तब आदमी,
वो चार आदमी....
बचा दे जो इज्जत का खिलवाड़,
या रोके सरेराह बेटियों पर तंज प्रहार,
है तब आदमी,
वो चार आदमी....
सुख-चैन कायम करें,
खुशी का आकार बढ़ा दे,
वो चार आदमी....
समाज को,
आधुनिकता का भेष पहना दे,
है तब आदमी,
वो चार आदमी....
बूढ़े कपकपाते हाथों का सहारा बन जाए,
समाज के पैरों में पगड़ी रखने से बचाए,
कुव्यथा-कुप्रथा से बचाए,
है तब आदमी,
वो चार आदमी.....
"इन्द्राज योगी"


