धवल चांदनी उतर रही,

स्पर्श करने रश्मिकों के ढेर को,

नैनो को चौंधियाती,

छितराई तुहिर श्वेत कर धरा को.....


ऊंची-ऊंची चोटियों का,

है देखो अब कद बड़ा,

स्वर्ग के धवल कणों से,

है देखो इनका मान बढ़ा....


बरस रहे है,

बिखर रहे है,

रुई मानू या पंखुड़ी श्वेत पंकज की,

गिर रहे निर्जन भागो को,

बना रहे है आज सर्जन...


श्वेत चादर ओढ़ बैठे,

है महात्मा महान कोई,

तटस्थ,अविचलित,अस्थिर,

है श्वेत शैल शीला-सा कोई....


विपदा मौसम सर्द की,

मनुस्यारी जनजीवन कठिन,

है लेकिन खुशी न्यारी,

अद्भुत,विस्मयकारी,

इन पहाड़ों की बर्फबारी....


शुभ्र चमक से सरबोर,

खड़ा निर्जन में मैं हूं,

बेबस लाचार शीश झुकाए,

हिम से भरा देवदार मैं हूं....


खिली जब एक छोटी किरण,

लिए साथ धूप सुनहरी,

एक राहत का अहसास,

क्षणिक-सी वो दुपहरी....



रोके कौन जलधारा को,

होगा किस के वश में यहां,

रोके स्रावित जल स्रोतों को,

है जमे कई देखो यहां-वहां.....


प्रभात किरण की लुका-छिपी,

है प्रकृति को संवारती,

धवल श्वेत चोटियों को,

सोने के रंग में उतारती.....


घन-मेघ,बादल,

है इनकी सुन्दरता,

है लेकिन नतमस्तक इनके आगे,

बगल से निकले सहारे सहारे....


होगा ही नहीं कोई खोट,

होंगे सदा ही निष्कलंक,

बेहतरीन है चमक सदा से,

कभी ना फीकी पड़ी,

दमक इनकी.…..


आते है मन को लुभाने,

बाहों में बाहें डाले,

है फिर भी कोई ना,

इनका हो पाया,

पड़ी बर्फ तो छीना,

सूरज का भी साया.....

"इन्द्राज योगी"